कुंभकर्ण का जीवन परिचय | Kumbhakarna biography in Hindi

Kumbhakarna biography in Hindi

दोस्तों आप सभी लोग रामायण में प्रमुख रोल अदा करने वाले कुंभकर्ण में बारे में तो थोड़ा बहुत जानते ही होंगे, जो रावण का छोटा भाई था लेकिन क्या आप लोगों को इनके जीवन के बारे में पूरी जानकारी है अगर नही, तो आइये आज इस आर्टिकल में हम कुंभकर्ण के जीवन से सम्बंधित पूरी जानकारी लेते हैं.

Kumbhakarna biography in Hindi

कुंभकर्ण का जीवन परिचय (Kumbhakarna biography in Hindi)

कुंभकर्ण की माता कैकसी राक्षस वंश की थी और पिता विशर्वा ब्राह्मण कुल के थे. कुंभकर्ण में माता पिता दोनों के गुण विद्यमान थे माता कैकसी के मन में सत्ता एवं शक्ति दोनों का लोभ था इसलिये वे अपने पुत्रो को पृथ्वी के स्वामी के रूप में देखती थी और इनके पिता विशर्वा ब्राहमण थे जिनमे अपार ज्ञान एवम शालीनता थी और वे उसी तरह से अपने पुत्रो को बनता देखना चाहते थे माता पिता के अलग अलग स्वभाव और संस्कारों के कारण ही तीनों पुत्रो रावण, कुंभकर्ण और विभीषण में दोनों के गुण निहित थे.

रावण को राक्षसों के समान सत्ता का लोभ था और शक्ति का घमंड था लेकिन अपने पिता के समान वे भी चारों वेदों का ज्ञाता थे लेकिन माँ की छाया में रहने के कारण उसकी अच्छाई पर बुराई का प्रभाव ज्यादा उभर कर सामने आया. वही कुंभकर्ण में भी अपार शक्ति थी लेकिन भाई प्रेम के कारण उसने कभी अपने भाई का विरोध नहीं किया. वही विभीषण पर पिता की छाया अधिक थी इसलिये उसने सदैव अपने भाई रावण को सही गलत का भेद समझाया.

बाल्यावस्था से ही तीनों भाइयों ने कई प्रकार से विद्या ग्रहण की, रावण पर माता के गुणों का प्रभाव अधिक था और विभीषण पर पिता की सीख का ज्यादा प्रभाव था लेकिन कुंभकर्ण में दोनों के गुण विद्यमान थे, कुंभकर्ण को खाने का बहुत अधिक शौक था और अपने बड़े भाई के प्रति अंधी श्रद्धा भी थी, कुंभकर्ण की काया बहुत ही विशाल थी इनमे कई हाथियों का बल था और वो अकेले एक साथ कई गाँव के लोगो का भोजन खा सकता था, उससे बात करने के लिये सीढ़ियों के जरिये उस तक पहुँचाना पड़ता था, वो मनुष्यों को अपनी एक हथेली पर बैठा सकता था इतना बलशाली होने के बाद भी कुंभकर्ण के द्वारा प्राप्त किया वरदान उसके लिए अभिशाप बन गया था.

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तीनों भाइयों ने ब्रह्मदेव की कठिन तपस्या करना शुरू किया, कुंभकर्ण के अंदर स्वर्ग पाने की इच्छा थी क्यूंकि वो पूरा जीवन भर पेट भोजन करना चाहता था उसकी इस इच्छा के कारण सभी देवता काफी ज्यादा चिंतित थे क्यूंकि अगर उसकी इच्छा पूरी हो जाती तो पूरे संसार का पूरा भोजन खत्म हो जाता और सभी जगह त्राहि-त्राहि मच जाती. इस समस्या के निवारण के लिये सभी देवता ब्रह्मदेव के पास जाते हैं उसके बाद माता सरस्वती इस समस्या का निवारण करते हए कहती हैं कि जब कुंभकर्ण वरदान मांगेगा तो मैं उसकी जिव्हा पर बैठ जाउंगी और वो बोल नहीं पायेगा.

कुछ समय बाद ब्रह्मदेव कुंभकर्ण की तपस्या से प्रसन्न हो जाते है और उसे दर्शन देकर मनचाहा वरदान मांगने को कहते हैं तो कुंभकर्ण जैसे ही इन्द्रासन बोलने के लिये अपना मुँह खोलता हैं उसकी जिव्हा पर देवी सरस्वती का वास होने के कारण मुँह से इन्द्रासन के जगह निन्द्रासन निकल जाता हैं ब्रह्म जी उसे तथास्तु कह देते हैं इसके बाद कुंभकर्ण बहुत दुखी होकर ब्रह्म जी के सामने विलाप करने लगता हैं और प्रार्थना करता हैं कि ब्रह्म जी उसकी सहायता करें. तब ब्रह्म जी कहते हैं कि दिया हुआ वरदान वापस नहीं लिया जा सकता लेकिन मैं तुम्हारी भक्ति से अति प्रसन्न हूँ इसीलिये इतना कह सकता हूं कि तुम 6 महीने तक सोते रहोगे, 6 महीने पूरे होने के बाद तुम एक दिन के लिए जागोगे और फिर से 6 महीने के लिये सो जाओगे. बहत ही दुखी मन से कुंभकर्ण इस बात को स्वीकार करता है.

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इस तरह से कुंभकर्ण का वरदान ही उसके लिये अभिशाप गया, वो छह महीनों तक सोता रहता था और फिर सिर्फ एक दिन के लिए उठता था जिसमे वो भर पेट भोजन करना था अपने सगे संबंधियों से मिलता और पुनः सो जाता था कुंभकर्ण का होना या न होना बराबर हो चुका था ऐसी स्थिति में उसे अपने भाई रावण के अधर्म के कार्यों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. कई सालो बाद जब रावण ने सीता मैया का अपहरण किया, तब भगवान राम ने लंका पर युद्ध के लिये चढ़ाई की, युद्ध में जब रावण हार रहा था तो उसने अपने बलशाली भाई कुंभकर्ण की याद आई और उसने उसे जगाने का हुक्म दिया था चूँकि कुंभकर्ण को सोये अधिक समय नहीं हुआ था

उसे जगाने के लिये बहुत सारे कार्य किये गये बहुत नगाड़े बजाये गये, बहुत सारी मुश्किलों के बाद कुंभकर्ण की निद्रा टूटी और उठते ही उसने बहुत सारा भर पेट भोजन खाया और फिर आश्चर्य से पूछा कि क्या उसे सोये हुए 6 महीन हो गए? तब उसे लंका पर छाये संकट के बारे में सारी बातें बताई गयी, पूरी बात  जानने के बाद कुंभकर्ण को भी इस बात का अहसास हो गया कि उसके भाई रावण ने गलत काम किया हैं और उसने रावण को बहत  समझाया, लेकिन रावण ने उसकी बात नहीं मानी और कहा कि अगर वो चाहे तो विभीषण की तरह वो भी उसे छोड़ कर जा सकता हैं लेकिन भाई प्रेम के कारण कुंभकर्ण ने युद्ध में जाने के लिए तैयार हो गये.

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अगले दिन कुंभकर्ण युद्धभूमि में गया और उसने चीटियों की तरह राम की वानर सेना को कुचलने लगा, उसे देख कर सभी लोग डर गये और पूरी सेना में हाहाकार मच गया, तब विभीषण ने सभी को विस्तार से कुंभकर्ण के बारे में बताया, कुंभकर्ण जैसे-जैसे आगे बढ़ता जा रहा था भगवान राम की सेना खत्म हो होती जा रही थी तभी उसकी मुलाकात विभीषण से होती हैं और विभीषण उसे श्री राम की शरण में जाने को कहता हैं लेकिन कुंभकर्ण ने इन्कार कर दिया और विभीषण को विश्वासघाती, घर का भेदी कहकर अपमानित किया और उसने यह भी कहा हैं कि वो जानता हैं कि वो आज जीवित नहीं बचेगा लेकिन वो कठिन समय में अपने भाई रावण का साथ नहीं छोड़ सकता और वो आगे बढ़ता ही जाता हैं.

अपनी सेना की ऐसी स्थिति को देखकर भगवान राम ने स्वयं युद्ध भूमि में जाने का निर्णय लेते है, उसके बाद भगवान राम और कुंभकर्ण का युद्ध होता है और अन्त में कुंभकर्ण वीरगति को प्राप्त हुहो जाता है और उसने अपने अंतिम समय में भगवान राम को सह्रदय प्रणाम किया क्यूंकि उसे पता था कि राम भगवान विष्णु का अवतार हैं. और उनके हाथों से मिली मृत्यु से कुंभकर्ण का उद्धार हो जायेगा.

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आज आपने क्या सीखा?      

दोस्तों हम उम्मीद करते है कि हमारा ये (Kumbhakarna biography in Hindi) आर्टिकल आपको काफी पसंद आया होगा और आपके लिए काफी हेल्पफुल भी होगा क्युकी इसमें हमने आपको कुंभकर्ण के जीवन के बारे में पूरी जानकारी दी है

हमारी ये (Kumbhakarna biography in Hindi) जानकारी आपको कैसी लगी कमेंट करके जरुर बताइयेगा और ज्यादा से ज्यादा लोगो के साथ भी जरुर शेयर कीजियेगा.

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